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फाख्ताएं -जोगिंदर पाल

(अनुवाद - कृष्ण पाल )


इस कहानी को पढ़ते समय मैं अकेलेपन की यात्रा पर चल पड़ी। उस अकेलेपन में मेरे साथ कहानी का मुख्य पात्र लोभसिंह भी मौजूद था। उसकी कहानी बड़े ही इत्मीनान से मैं काले अक्षरों में पढ़ रही थी। लोभसिंह जिसने विभाजन को न सिर्फ़ देखा था बल्कि अन्दर तक महसूस भी किया था। लोभसिंह का एक वाक्य – “मैं बहुत अकेला पड़ गया हूँ” , मेरी यात्रा का पहला ठहराव यही वाक्य था ‘मैं अकेला’, विभाजन के उस दौर में न जाने कितने ही ऐसे लोग थे, घर थे, मकान थे, गलियां थीं, शहर थे जो अकेले पड़ गए थे। धीरे-धीरे उस ठहराव के बाद जब मैं आगे बड़ी तो लोभ्या की तरह ही मुझे भी एक आवाज़ सुनाई दी, “लोभसिंह को पचपन-साठ के फासले पर अपनी माँ की आवाज़ सुनाई दी है लोभया! लोभया!” , यादों की आवाज़ कभी कम नहीं होती, निरंतर हमारे मन में उसकी अनुगूंज सुनाई देती रहती है, पाकिस्तान और हिंदुस्तान की यादों के बीच त्रासदी की पगडंडी पर लोभसिंह चल रहा था, सिर्फ़ लोभसिंह ही नहीं तमाम वो लोग भी जिन्हें अपना सब कुछ छोड़ कर बस पोटली में अपने गाँव की यादों को लेकर जाना पड़ा, पर मैं इस बार ठहरी नहीं , सिर्फ़ महसूस कर सकी उन यादों का दर्द!


“स्वर्गीय भाई को ख़त लिख भेजा, जो वापस आ गया था या फ़िर शायद यह है कि अपने सही पते पर आ पंहुचा, क्योंकि किसी की मौत के बाद जब हम उससे मुख़ातिब होते हैं तो उसकी तरफ से भी हम ही को अपनी बात सुननी होती है। मरनेवाला तो मर गया, पर उसे जीने के लिए हम जिंदा हैं”, इन पंक्तियों को पढने के बाद मैं रुकी नहीं बल्कि लोभसिंह को देखती रही कभी अपने भाई को जी रहा था, कभी अपनी पत्नी को , कभी अपने छूटे हुए मित्र को और कभी अपनी माँ को, पर उस अकेलेपन के दर्द में खुद मर चुका था – जीते जी मर जाना ........

विभाजन के बाद आए दिल्ली, प्रवासी लोभसिंह कहता है – “एक बार घर जो छूट गया यारों, तो बैठे-बैठे भी यही लगता है कि कहीं भागे जा रहे हैं।” मैं भी भाग रही थी इस यात्रा के अंत के इंतज़ार में क्योंकि लोभसिंह का दर्द असहनीय था और उसका अनुभव करने में खुद को असमर्थ पा रही थी, अकेलेपन से भागते-भागते हम फ़िर उसी अकेलेपन के पास आ जाते हैं, जैसे लोभसिंह और मैं!


इस यात्रा के अंतिम पड़ाव पर मुझे फाख्ता पक्षी दिखा, और तब जाके पाल जी के शीर्षक के रहस्य को समझ सकी। फाख्ता – ‘प्रवासी पक्षी’ – एक पात्र कहानी का लोभसिंह से कहता है –“फाख्ता बनकर उड़ जाओ सरकार”!

मेरी यात्रा तो यही समाप्त होती है पर विभाजन की पीड़ा की यात्रा अनवरत है।

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